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गलती चीन की लेकिन दुनिया के इन 134 देशों से बाढ़ के नुकसान का मुआवजा क्यों मांग रहा नेपाल?

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नेपाल में रसुवा की विनाशकारी बाढ़ के बाद सरकार ने हानि और नुकसान कोष से आर्थिक मदद मांगी है.

नेपाल के रसुवा जिले में आए भयानक सैलाब में हजारों से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. काफी लोग अब भी लापता है. इस बीच अब राहत और बचाव के साथ-साथ इससे हुए नुकसान की भरपाई को लेकर बहस भी तेज हो गई है. दरअसल,नेपाल सरकार ने सैलाब में हुए नुकसान की भरपाई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुआवजे की मांग उठाई है.
नेपाल सरकार ने दावा किया है कि भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदा है. इसी आधार पर नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन व्यवस्था के तहत काम करने वाले लॉस और डैमेज फंड के तहत आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए.
नेपाल के जलवायु परिवर्तन प्रबंधन प्रभाग के प्रमुख डॉ. महेश्वर ढकाल के मुताबिक नेपाल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में बेहद कम योगदान देता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के असर से उसे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. विश्व बैंक के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल में प्रति व्यक्ति सालाना कार्बन उत्सर्जन करीब 0.54 टन है, जबकि वैश्विक औसत 4.67 टन है. चीन में यह आंकड़ा 9.3 टन और अमेरिका में 13.6 टन है.

26 अगस्त को नेपाल में क्या हुआ?

26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के इलाके में अचानक भीषण बाढ़ आई. इसकी शुरुआत हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से हुई, जिसके बाद नदी में अचानक भारी मात्रा में मलबा और पानी पहुंचा. इसने नदी के आसपास के इलाकों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया. अब नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन व्यवस्था के तहत काम करने वाले लॉस और डैमेज फंड के तहत आर्थिक सहायता मांगी है.

क्या है लॉस और डैमेज फंड?

जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए दो शब्द बहुत अहम है एडाप्शन और लॉस डैमेज. एडाप्शन का मतलब है जलवायु परिवर्तन से आने वाले खतरों के लिए पहले से तैयारी करना. वहीं लॉस और डैमेज का मतलब उस नुकसान से है, जिसे सिर्फ तैयारी करके पूरी तरह रोका नहीं जा सकता.इसमें बाढ़, तूफान या ग्लेशियर टूटने से लोगों की मौत, घरों, सड़कों, पुलों और खेती को होने वाला भारी नुकसान शामिल है. इसी नुकसान की भरपाई में मदद के लिए 2022 में COP27 में लॉस एंड डैमेज फंड बनाने पर सहमति बनी थी. इसका मकसद जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित विकासशील देशों को आर्थिक मदद देना है.

नेपाल किन देशों से मुआवजा मांगा?

  • लॉस एंड डैमेज की बहस विकासशील देशों के बड़े समूह से जुड़ी है.
  • G77 और China समूह में 134 से अधिक विकासशील देश शामिल हैं.
  • इस समूह ने लंबे समय से जलवायु आपदाओं से होने वाले नुकसान के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था की मांग की है.
  • नेपाल ने मौजूदा मामले में लॉस एंड डैमेज फंड से आर्थिक सहायता मांगी है.
  • यह फंड किसी एक देश से सीधे मुआवजा वसूलकर प्रभावित देश को देने वाली व्यवस्था नहीं है.
  • इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विकासशील देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है.
  • इसलिए नेपाल की मांग को सीधे चीन से मुआवजे के तौर पर देखना सही नहीं होगा.
  • नेपाल दरअसल अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त व्यवस्था के तहत फंड से मदद पाने की कोशिश कर रहा है.

नेपाल को मदद के तौर पर कितनी राशि मिल सकती है?

नेपाल ने अपनी मांग में कोई निश्चित रकम तय नहीं की है. फंड ने 134 देशों से मदद हासिल करने के लिए 5 से 20 मिलियन डॉलर तक के प्रस्ताव मांगे हैं. एक अनुमान के मुताबिक नेपाल को अधिकतम करीब 20 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 3 अरब नेपाली रुपये, मिल सकते हैं. लेकिन यह है कि नेपाल के नुकसान का अनुमान इससे कई गुना ज्यादा है. नेपाल के सड़क विभाग के शुरुआती अनुमान के मुताबिक सिर्फ क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों के पुनर्निर्माण में ही करीब 50 अरब नेपाली रुपये खर्च हो सकते हैं. यानी अगर नेपाल को फंड से 20 मिलियन डॉलर भी मिलते हैं, तो वह कुल नुकसान की तुलना में बेहद छोटी रकम होगी.

चीन की किन गलतियों की बात की जा रही है?

  • सीमा पार होने वाली आपदा में कुछ मिनट भी लोगों की जान बचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. यही समय लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और बड़ी संख्या में जानें बचाने के बीच अंतर पैदा कर सकता था. लेकिन चीन को नेपाल से सही समय पर जानकारी नहीं मिली.
  • चीन ने शुरुआत में इसे भूकंप का नतीजा बताया. लेकिन बाद में USGS ने संकेत दिया कि यह सामान्य भूकंप नहीं, बल्कि एक विशाल ग्लेशियर और मलबे के ढहने से जुड़ी घटना थी.
  • चीन इस संवेदनशील क्षेत्र का स्वरूप बदल रहा है. चीन दुनिया के सबसे कमजोर और भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील पर्वतीय इलाकों में हाईवे, रेलवे, बांध और नए शहर बना रहा है. ऐसे निर्माण हिमालय जैसे नाजुक इलाके में पर्यावरणीय और भूगर्भीय जोखिम बढ़ा सकते हैं.
  • चीनी वैज्ञानिक पहले ही चेतावनी दे चुके थे.चीनी वैज्ञानिकों ने अस्थिर ढलानों, कमजोर जमीन और इस खतरे की ओर इशारा किया था कि एक जगह का भू-स्खलन दूसरी जगहों पर भी श्रृंखलाबद्ध घटनाएं पैदा कर सकता है. इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहे.
  • चीन ने आपदा का वास्तविक पैमाना छिपाया. चीनी रिपोर्टों में शुरुआत में केवल कुछ मौतों की पुष्टि की गई, जबकि तिब्बत में सैकड़ों लोग लापता बताए जा रहे थे और सीमा पार नेपाल में हुए नुकसान को भी देखा जा सकता था. आरोप है कि चीन ने जानकारी को नियंत्रित करने की कोशिश की.

लॉस और डैमेज फंड को लेकर क्या चुनौतियां हैं?

लॉस और डैमेज फंड 134 देशों को करीब करीब 82 करोड़ डॉलर की सहायता की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इसमें से लगभग 40 करोड़ डॉलर ही जमा हुए हैं. दूसरी तरफ कई देशों की जरूरतें बहुत बड़ी हैं. असली सवाल यह है कि जलवायु आपदाओं का सामना कर रहे गरीब और विकासशील देशों की बढ़ती जरूरतों के मुकाबले दुनिया का लॉस और डैमेज फंड कितना बड़ा है. साथ ही नेपाल अगर यह साबित कर देता है कि रसुवा में आई बाढ़ जलवायू संबंधित आपदा है, तो उसे कितनी मदद मिलेगी.
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