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Iran के खिलाफ ट्रंप का ऑयल बम, तेहरान के लिए कैसे बना सबसे बड़ा संकट?

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होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नाकेबंदी से ईरान अपना तेल बेच नहीं पा रहा है.

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ युद्धविराम भले ही बढ़ा दिया हो लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक बने हुए हैं. जिसकी वजह होर्मुज की नाकाबंदी (ब्लॉकेड) है. ट्रंप ने साफ कहा है कि नाकाबंदी जारी रखेगा. इस बीच मिडिल- ईस्ट में एक अजीब और गंभीर स्थिति बन गई है. एक तरफ दुनिया के कई हिस्सों में तेल की कमी और ऊंची कीमतें परेशानी का सबब बनी हुई हैं. तो दूसरी तरफ ईरान के पास इतना तेल हो गया है कि उसे रखने की जगह कम पड़ रही है.
दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के अमेरिकी नेवी ने होर्मुज स्ट्रेट में कड़ी नाकेबंदी की हुई है, जिससे ईरान के तेल के टैंकर कहीं आ जा नहीं सकते. ऐसे में हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि ईरान का सबसे बड़ा संसाधन यानी उसका तेल अब उसके लिए ही बोझ बनता जा रहा है.

ईरानी तेल के साथ क्या हो रहा है?

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक ईरानी बंदरगाहों की ओर आने-जाने वाले जहाजों पर कड़ी निगरानी है. खबर के मुताबिक अब तक 34 से ज़्यादा जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया है. नाकेबंदी के लिए कई दशकों के बाद पहली बार एक साथ तीन अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln (CVN-72), USS Gerald R. Ford (CVN-78), USS George H. W. Bush (CVN-77) मध्य-पूर्व में तैनात हैं.
इनके साथ 200 से ज़्यादा लड़ाकू विमान और हजारों सैनिक मौजूद हैं. ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद जंग से पहले ईरानी तेल चीन और कई दूसरे देशों को निर्यात हो रहा था लेकिन अभी अमेरिकी निगरानी में यह संभव नहीं हो पा रहा है .

तेल है, लेकिन बेच नहीं पा रहा ईरान

ईरान का लगभग 90% तेल Kharg Island से बाहर जाता है.लेकिन अब कोई जहाज नहीं आ पा रहे. निर्यात लगभग ठप है और उत्पादन जारी है. नतीजा यह है कि तेल जमा होता जा रहा है लेकिन उसे रखने की जगह नहीं है. वहीं स्टोरेज टैंक तेजी से भर रहे हैं. स्थिति यह है कि ईरान को अपने पुराने टैंकर तक वापस चालू करने पड़ रहे हैं ताकि समुद्र में ही तेल रखा जा सके. लेकिन उससे भी केवल दो या तीन दिन का ही तेल रखा जा सकता है.

कुएं बंद करने की नौबत

ईरान में अगर तेल रखने की जगह पूरी तरह खत्म हो गई, तो उसे मजबूरी में अपने तेल के कुएँ (oil wells) बंद करने पड़ेंगे. यह बहुत गंभीर बात है. एक बार अगर कुएं लंबे समय के लिए बंद हो गए फिर उन तेल के कुओं से फिर उत्पादन पूरी तरह वापस नहीं आ पाता यानी हमेशा हमेशा के लिए तेल के कुओं का नुक़सान हो जाएगा. इससे लाखों बैरल प्रतिदिन की उत्पादन क्षमता खत्म हो सकती है. यानी यह सिर्फ आज का नुकसान नहीं, बल्कि आने वाले कई सालों का झटका हो सकता है. इससे ईरान की अर्थव्यस्था पर भी असर पड़ेगा.
ये कहा जा सकता है कि दुनिया के कई देश तेल की कमी का सामना कर रहे हैं, लेकिन ईरान में तेल की अधिकता है. यह स्थिति अमेरिकी नाकेबंदी की वजह से बन रही है. दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ने का डर है तो ईरान में तेल रखने की जगह नहीं मिल रही है. मतलब जिस तेल को बेचकर ईरान अरबों डॉलर कमा सकता था, वही अब उसके लिए संकट बन गया है.

ईरान के सामने क्या विकल्प हैं?

  • छुपकर तेल बेचना (Shadow Trade)
  • जहाजों की पहचान छिपाकर
  • दूसरे देशों के जरिए ट्रांसफर
  • समुद्र में स्टोरेज (Floating Storage)
  • पुराने टैंकरों का इस्तेमाल
लेकिन यह सब बहुत सीमित समाधान है और अमेरिकन नाकेबंदी की वजह से इसमें से कई विकल्प आज़माए नहीं जा सकते . ईरान के लिए सबसे कठिन और नुकसानदेह विकल्प उत्पादन कम करना (Shut-in) है.

राजनयिक रास्ता

ऐसे में इस मुश्किल से निकलने के लिए ईरान के पास बातचीत और तनाव कम करने की कोशिश ही एकमात्र विकल्प बचा है, जिससे तेल के नुक़सान को रोका जा सकता है.

न्यूक्लियर और मिसाइल से पहले अब तेल की जंग

अब तक ईरान को उसकी न्यूक्लियर क्षमता और मिसाइल प्रोग्राम के लिए जंग लड़ना पड़ रहा है लेकिन इस वक्त हालात यह हैं कि ईरान को अब अपने ही तेल को बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी. यह एक नई तरह की जंग है, जहां बम नहीं गिर रहे, लेकिन असर उतना ही गहरा हो सकता है .
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